भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 25 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 3.25 · सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥
saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata |
kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham ||
हिन्दी अनुवाद
हे भारत, जैसे अज्ञानी लोग आसक्त होकर कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को लोकसंग्रह की इच्छा से अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 3.25 का अर्थ क्या है?
हे भारत, जैसे अज्ञानी लोग आसक्त होकर कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को लोकसंग्रह की इच्छा से अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए।
भगवद्गीता 3.25 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।