भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 26 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.26 · न बुद्धिभेदं

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥

na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām |
joṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran ||

हिन्दी अनुवाद

ज्ञानी को चाहिए कि कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे; बल्कि स्वयं योग में स्थित होकर सब कर्म भली-भाँति करते हुए उन्हें भी कर्म में लगाए रखे।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.26 का अर्थ क्या है?

ज्ञानी को चाहिए कि कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे; बल्कि स्वयं योग में स्थित होकर सब कर्म भली-भाँति करते हुए उन्हें भी कर्म में लगाए रखे।

भगवद्गीता 3.26 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।