भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 42 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.42 · यामिमां पुष्पितां वाचं
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
yāmimāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadantyavipaścitaḥ |
vedavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ, कुछ अविवेकी लोग वेद के शब्दों में ही रमे रहते हैं और कहते हैं कि इसके सिवा कुछ है ही नहीं। वे फूलों-सी लुभावनी वाणी बोलते हैं —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.42 का अर्थ क्या है?
हे पार्थ, कुछ अविवेकी लोग वेद के शब्दों में ही रमे रहते हैं और कहते हैं कि इसके सिवा कुछ है ही नहीं। वे फूलों-सी लुभावनी वाणी बोलते हैं —
भगवद्गीता 2.42 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।