भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 41 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.41 · व्यवसायात्मिका कुरुनन्दन
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana |
bahuśākhā hyanantāśca buddhayo’vyavasāyinām ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुरुनन्दन, इस मार्ग में निश्चय वाली बुद्धि एक ही होती है; पर जिनकी बुद्धि अनिश्चित है, उनके विचार अनगिनत शाखाओं में बँटे रहते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.41 का अर्थ क्या है?
हे कुरुनन्दन, इस मार्ग में निश्चय वाली बुद्धि एक ही होती है; पर जिनकी बुद्धि अनिश्चित है, उनके विचार अनगिनत शाखाओं में बँटे रहते हैं।
भगवद्गीता 2.41 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।