भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 43 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 2.43 · कामात्मानः स्वर्गपरा

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥

kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām |
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati ||

हिन्दी अनुवाद

— उनका मन कामनाओं से भरा है और स्वर्ग ही उनका परम लक्ष्य है। उनकी वह वाणी कर्मों के फल के रूप में नया जन्म देने वाली है और भोग तथा ऐश्वर्य पाने के लिए तरह-तरह के कर्मकाण्डों से भरी है —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 2.43 का अर्थ क्या है?

— उनका मन कामनाओं से भरा है और स्वर्ग ही उनका परम लक्ष्य है। उनकी वह वाणी कर्मों के फल के रूप में नया जन्म देने वाली है और भोग तथा ऐश्वर्य पाने के लिए तरह-तरह के कर्मकाण्डों से भरी है —

भगवद्गीता 2.43 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।