भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 40 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 2.40 · नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति न
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
nehābhikramanāśo’sti pratyavāyo na vidyate |
svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||
हिन्दी अनुवाद
इस मार्ग में किया गया आरंभ कभी व्यर्थ नहीं जाता और इसमें उलटा परिणाम भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचा लेता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है। इस अध्याय में 72 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 2.40 का अर्थ क्या है?
इस मार्ग में किया गया आरंभ कभी व्यर्थ नहीं जाता और इसमें उलटा परिणाम भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचा लेता है।
भगवद्गीता 2.40 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 2, साङ्ख्ययोग (सांख्य योग — ज्ञान का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।