भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 50 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.50 · सिद्धिं प्राप्तो यथा मे
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥
siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me |
samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, सिद्धि पाया हुआ मनुष्य ज्ञान की उस परम निष्ठा, ब्रह्म को, कैसे प्राप्त होता है — यह मुझसे संक्षेप में जानो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.50 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र, सिद्धि पाया हुआ मनुष्य ज्ञान की उस परम निष्ठा, ब्रह्म को, कैसे प्राप्त होता है — यह मुझसे संक्षेप में जानो।
भगवद्गीता 18.50 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।