भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 49 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.49 · असक्तबुद्धिः सर्वत्र
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati ||
हिन्दी अनुवाद
जिसकी बुद्धि कहीं भी आसक्त नहीं, जिसने अपने आप को जीत लिया है और जिसकी लालसा मिट गई है, वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्य की परम सिद्धि को पाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.49 का अर्थ क्या है?
जिसकी बुद्धि कहीं भी आसक्त नहीं, जिसने अपने आप को जीत लिया है और जिसकी लालसा मिट गई है, वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्य की परम सिद्धि को पाता है।
भगवद्गीता 18.49 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।