भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 42 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.42 · शमो दमस्तपः शौचं च
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca |
jñānaṃ vijñānamāstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam ||
हिन्दी अनुवाद
शम, दम, तप, पवित्रता, क्षमा और सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता — ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.42 का अर्थ क्या है?
शम, दम, तप, पवित्रता, क्षमा और सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता — ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
भगवद्गीता 18.42 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।