भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 43 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.43 · शौर्यं तेजो युद्धे

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥

śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cāpyapalāyanam |
dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṃ karma svabhāvajam ||

हिन्दी अनुवाद

शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से पीछे न हटना, दान और नेतृत्व का भाव — ये क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.43 का अर्थ क्या है?

शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से पीछे न हटना, दान और नेतृत्व का भाव — ये क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।

भगवद्गीता 18.43 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।