भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 20 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.20 · सर्वभूतेषु येनैकं

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥

sarvabhūteṣu yenaikaṃ bhāvamavyayamīkṣate |
avibhaktaṃ vibhakteṣu tajjñānaṃ viddhi sāttvikam ||

हिन्दी अनुवाद

जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक ही अविनाशी भाव को, विभक्त दिखने वालों में अविभक्त रूप से देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.20 का अर्थ क्या है?

जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक ही अविनाशी भाव को, विभक्त दिखने वालों में अविभक्त रूप से देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।

भगवद्गीता 18.20 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।