भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 21 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.21 · पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥

pṛthaktvena tu yajjñānaṃ nānābhāvānpṛthagvidhān |
vetti sarveṣu bhūteṣu tajjñānaṃ viddhi rājasam ||

हिन्दी अनुवाद

पर जो ज्ञान सब प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के भिन्न-भिन्न भावों को अलग-अलग करके ही देखता है, उस ज्ञान को राजस जानो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.21 का अर्थ क्या है?

पर जो ज्ञान सब प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के भिन्न-भिन्न भावों को अलग-अलग करके ही देखता है, उस ज्ञान को राजस जानो।

भगवद्गीता 18.21 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।