भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.16 · तत्रैवं सति केवलं तु यः

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥

tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ |
paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ ||

हिन्दी अनुवाद

ऐसा होने पर भी जो अपरिपक्व बुद्धि के कारण केवल आत्मा को ही कर्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि सही नहीं देखता।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.16 का अर्थ क्या है?

ऐसा होने पर भी जो अपरिपक्व बुद्धि के कारण केवल आत्मा को ही कर्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि सही नहीं देखता।

भगवद्गीता 18.16 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।