भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.15 · शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
śarīravāṅmanobhiryatkarma prārabhate naraḥ |
nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
मनुष्य शरीर, वाणी या मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, चाहे उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच ही कारण होते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.15 का अर्थ क्या है?
मनुष्य शरीर, वाणी या मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, चाहे उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच ही कारण होते हैं।
भगवद्गीता 18.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।