भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.17 · यस्य नाहंकृतो भावो न
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥
yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate |
hatvāpi sa imām̐llokānna hanti na nibadhyate ||
हिन्दी अनुवाद
जिसमें “मैं कर्ता हूँ” का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न मारता है और न उस कर्म से बँधता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.17 का अर्थ क्या है?
जिसमें “मैं कर्ता हूँ” का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न मारता है और न उस कर्म से बँधता है।
भगवद्गीता 18.17 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।