भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 14 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.14 · अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥

adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham |
vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam ||

हिन्दी अनुवाद

— कर्म का आधार अर्थात शरीर, कर्ता, अलग-अलग साधन, तरह-तरह की अलग-अलग चेष्टाएँ, और इनमें पाँचवाँ दैव।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.14 का अर्थ क्या है?

— कर्म का आधार अर्थात शरीर, कर्ता, अलग-अलग साधन, तरह-तरह की अलग-अलग चेष्टाएँ, और इनमें पाँचवाँ दैव।

भगवद्गीता 18.14 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।