भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.9 · कट्‌वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः

कट्‌वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥

kaṭ‌vamlalavaṇātyuṣṇatīkṣṇarūkṣavidāhinaḥ |
āhārā rājasasyeṣṭā duḥkhaśokāmayapradāḥ ||

हिन्दी अनुवाद

बहुत कड़वे, खट्टे, नमकीन, अधिक गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले भोजन राजस लोगों को प्रिय होते हैं; ये दुःख, शोक और रोग देते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.9 का अर्थ क्या है?

बहुत कड़वे, खट्टे, नमकीन, अधिक गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले भोजन राजस लोगों को प्रिय होते हैं; ये दुःख, शोक और रोग देते हैं।

भगवद्गीता 17.9 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।