भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 13 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 17.13 · विधिहीनमसृष्टान्नं
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥
vidhihīnamasṛṣṭānnaṃ mantrahīnamadakṣiṇam |
śraddhāvirahitaṃ yajñaṃ tāmasaṃ paricakṣate ||
हिन्दी अनुवाद
जो यज्ञ विधि के बिना, अन्नदान के बिना, मन्त्रों के बिना, दक्षिणा के बिना और श्रद्धा के बिना किया जाता है, उसे तामस कहा जाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 17.13 का अर्थ क्या है?
जो यज्ञ विधि के बिना, अन्नदान के बिना, मन्त्रों के बिना, दक्षिणा के बिना और श्रद्धा के बिना किया जाता है, उसे तामस कहा जाता है।
भगवद्गीता 17.13 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।