भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.12 · अभिसंधाय तु फलं चैव यत्

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥

abhisaṃdhāya tu phalaṃ dambhārthamapi caiva yat |
ijyate bharataśreṣṭha taṃ yajñaṃ viddhi rājasam ||

हिन्दी अनुवाद

पर हे भरतश्रेष्ठ, जो यज्ञ फल को ध्यान में रखकर, या केवल दिखावे के लिए किया जाता है, उसे राजस जानो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.12 का अर्थ क्या है?

पर हे भरतश्रेष्ठ, जो यज्ञ फल को ध्यान में रखकर, या केवल दिखावे के लिए किया जाता है, उसे राजस जानो।

भगवद्गीता 17.12 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।