भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 10 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 16.10 · काममाश्रित्य दुष्पूरं
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥
kāmamāśritya duṣpūraṃ dambhamānamadānvitāḥ |
mohādgṛhītvāsadgrāhānpravartante’śucivratāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
कभी न भरने वाली कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से भरे हुए, मोह के कारण झूठी धारणाएँ पकड़कर, वे अपवित्र संकल्पों के साथ कर्मों में लगते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 16.10 का अर्थ क्या है?
कभी न भरने वाली कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से भरे हुए, मोह के कारण झूठी धारणाएँ पकड़कर, वे अपवित्र संकल्पों के साथ कर्मों में लगते हैं।
भगवद्गीता 16.10 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।