भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 16.9 · एतां दृष्टिमवष्टभ्य

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥

etāṃ dṛṣṭimavaṣṭabhya naṣṭātmāno’lpabuddhayaḥ |
prabhavantyugrakarmāṇaḥ kṣayāya jagato’hitāḥ ||

हिन्दी अनुवाद

इसी दृष्टि को पकड़कर, अपने आप को खो चुके, थोड़ी बुद्धि वाले और क्रूर कर्म करने वाले ये लोग संसार के शत्रु बनकर उसके विनाश के लिए उठ खड़े होते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 16.9 का अर्थ क्या है?

इसी दृष्टि को पकड़कर, अपने आप को खो चुके, थोड़ी बुद्धि वाले और क्रूर कर्म करने वाले ये लोग संसार के शत्रु बनकर उसके विनाश के लिए उठ खड़े होते हैं।

भगवद्गीता 16.9 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।