भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 22 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.22 · अनन्याश्चिन्तयन्तो मां
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate |
teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmyaham ||
हिन्दी अनुवाद
जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन सदा मुझसे जुड़े भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ — जो उनके पास नहीं है वह मैं देता हूँ, और जो है उसकी रक्षा करता हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.22 का अर्थ क्या है?
जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन सदा मुझसे जुड़े भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ — जो उनके पास नहीं है वह मैं देता हूँ, और जो है उसकी रक्षा करता हूँ।
भगवद्गीता 9.22 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।