भगवद्गीता · अध्याय 8, श्लोक 25 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 8.25 · धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
dhūmo rātristathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam |
tatra cāndramasaṃ jyotiryogī prāpya nivartate ||
हिन्दी अनुवाद
धुआँ, रात, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने — इस मार्ग से जाने वाला योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर फिर लौट आता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 8.25 का अर्थ क्या है?
धुआँ, रात, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने — इस मार्ग से जाने वाला योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर फिर लौट आता है।
भगवद्गीता 8.25 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।