भगवद्गीता · अध्याय 7, श्लोक 28 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 7.28 · येषां त्वन्तगतं पापं
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
yeṣāṃ tvantagataṃ pāpaṃ janānāṃ puṇyakarmaṇām |
te dvandvamohanirmuktā bhajante māṃ dṛḍhavratāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जिन पुण्यकर्मी लोगों के पाप समाप्त हो चुके हैं, वे द्वन्द्वों के मोह से छूटकर दृढ़ निश्चय के साथ मेरी उपासना करते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है। इस अध्याय में 30 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 7.28 का अर्थ क्या है?
परन्तु जिन पुण्यकर्मी लोगों के पाप समाप्त हो चुके हैं, वे द्वन्द्वों के मोह से छूटकर दृढ़ निश्चय के साथ मेरी उपासना करते हैं।
भगवद्गीता 7.28 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 7, ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान-विज्ञान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।