भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.9 · सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥

suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu |
sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate ||

हिन्दी अनुवाद

जो हितैषी, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष के पात्र और बन्धुओं में, तथा सज्जनों और पापियों में भी समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.9 का अर्थ क्या है?

जो हितैषी, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष के पात्र और बन्धुओं में, तथा सज्जनों और पापियों में भी समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।

भगवद्गीता 6.9 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।