भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.8 · ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥

jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ |
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जिसका मन ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो अविचल है, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान हैं, वह योगी योग में स्थित कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.8 का अर्थ क्या है?

जिसका मन ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो अविचल है, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान हैं, वह योगी योग में स्थित कहलाता है।

भगवद्गीता 6.8 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।