भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 2 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.2 · यं संन्यासमिति तं विद्धि
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava |
na hyasaṃnyastasaṃkalpo yogī bhavati kaścana ||
हिन्दी अनुवाद
हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहा जाता है, उसी को योग जानो; क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई योगी नहीं बनता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.2 का अर्थ क्या है?
हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहा जाता है, उसी को योग जानो; क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई योगी नहीं बनता।
भगवद्गीता 6.2 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।