भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 1 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.1 · अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥

anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ |
sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

श्रीभगवान बोले: जो कर्म के फल का सहारा लिए बिना अपना कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी — केवल अग्नि त्याग देने वाला या कर्म छोड़ देने वाला नहीं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.1 का अर्थ क्या है?

श्रीभगवान बोले: जो कर्म के फल का सहारा लिए बिना अपना कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी — केवल अग्नि त्याग देने वाला या कर्म छोड़ देने वाला नहीं।

भगवद्गीता 6.1 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।