भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.17 · युक्ताहारविहारस्य कर्मसु
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu |
yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā ||
हिन्दी अनुवाद
जिसका आहार और विहार संतुलित है, जिसकी कर्मों में चेष्टा संतुलित है, जिसका सोना और जागना संतुलित है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.17 का अर्थ क्या है?
जिसका आहार और विहार संतुलित है, जिसकी कर्मों में चेष्टा संतुलित है, जिसका सोना और जागना संतुलित है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
भगवद्गीता 6.17 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।