भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 6.12 · तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ |
upaviśyāsane yuñjyādyogamātmaviśuddhaye ||
हिन्दी अनुवाद
उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 6.12 का अर्थ क्या है?
उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
भगवद्गीता 6.12 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।