भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 11 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 6.11 · शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥

śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiramāsanamātmanaḥ |
nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājinakuśottaram ||

हिन्दी अनुवाद

वह किसी शुद्ध स्थान पर अपने लिए स्थिर आसन बिछाए, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, और जिस पर कुशा, मृगचर्म और वस्त्र एक के ऊपर एक बिछे हों।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 6.11 का अर्थ क्या है?

वह किसी शुद्ध स्थान पर अपने लिए स्थिर आसन बिछाए, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, और जिस पर कुशा, मृगचर्म और वस्त्र एक के ऊपर एक बिछे हों।

भगवद्गीता 6.11 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 6, ध्यानयोग (ध्यान योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।