भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 30 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.30 · अपरे नियताहाराः जुह्वति
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
apare niyatāhārāḥ prāṇānprāṇeṣu juhvati |
sarve’pyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
दूसरे लोग आहार नियमित करके प्राणों को प्राणों में होम करते हैं। ये सभी यज्ञ का मर्म जानते हैं और यज्ञ के द्वारा इनके पाप नष्ट हो चुके हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.30 का अर्थ क्या है?
दूसरे लोग आहार नियमित करके प्राणों को प्राणों में होम करते हैं। ये सभी यज्ञ का मर्म जानते हैं और यज्ञ के द्वारा इनके पाप नष्ट हो चुके हैं।
भगवद्गीता 4.30 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।