भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 25 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 4.25 · दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥

daivamevāpare yajñaṃ yoginaḥ paryupāsate |
brahmāgnāvapare yajñaṃ yajñenaivopajuhvati ||

हिन्दी अनुवाद

कुछ योगी देवताओं के लिए ही यज्ञ करते हैं; दूसरे ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ को ही आहुति बनाकर अर्पित कर देते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 4.25 का अर्थ क्या है?

कुछ योगी देवताओं के लिए ही यज्ञ करते हैं; दूसरे ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ को ही आहुति बनाकर अर्पित कर देते हैं।

भगवद्गीता 4.25 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।