भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 24 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.24 · ब्रह्मार्पणं ब्रह्म
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
brahmārpaṇaṃ brahma havirbrahmāgnau brahmaṇā hutam |
brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhinā ||
हिन्दी अनुवाद
अर्पण ब्रह्म है, आहुति ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म के द्वारा ही आहुति दी जाती है। जो सब कर्मों में ब्रह्म को देखता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.24 का अर्थ क्या है?
अर्पण ब्रह्म है, आहुति ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म के द्वारा ही आहुति दी जाती है। जो सब कर्मों में ब्रह्म को देखता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।
भगवद्गीता 4.24 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।