भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 32 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 3.32 · ये त्वेतदभ्यसूयन्तो मे
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam |
sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
पर जो दोष निकालते हुए मेरे इस मत का पालन नहीं करते, उन्हें सारे ज्ञान के विषय में भ्रमित, विवेकहीन और नष्ट हुआ समझो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 3.32 का अर्थ क्या है?
पर जो दोष निकालते हुए मेरे इस मत का पालन नहीं करते, उन्हें सारे ज्ञान के विषय में भ्रमित, विवेकहीन और नष्ट हुआ समझो।
भगवद्गीता 3.32 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।