भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 31 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 3.31 · ये मे मतमिदं मानवाः
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ |
śraddhāvanto’nasūyanto mucyante te’pi karmabhiḥ ||
हिन्दी अनुवाद
जो मनुष्य श्रद्धा के साथ, दोष-दृष्टि छोड़कर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से छूट जाते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 3.31 का अर्थ क्या है?
जो मनुष्य श्रद्धा के साथ, दोष-दृष्टि छोड़कर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से छूट जाते हैं।
भगवद्गीता 3.31 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।