भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 20 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.20 · कर्मणैव हि जनकादयः

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥

karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ |
lokasaṃgrahamevāpi saṃpaśyankartumarhasi ||

हिन्दी अनुवाद

जनक जैसे लोगों ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि पाई थी। लोकसंग्रह (संसार की भलाई और व्यवस्था) को ध्यान में रखकर भी तुम्हें कर्म करना ही चाहिए।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.20 का अर्थ क्या है?

जनक जैसे लोगों ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि पाई थी। लोकसंग्रह (संसार की भलाई और व्यवस्था) को ध्यान में रखकर भी तुम्हें कर्म करना ही चाहिए।

भगवद्गीता 3.20 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।