भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 37 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.37 · यत्तदग्रे विषमिव

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥

yattadagre viṣamiva pariṇāme’mṛtopamam |
tatsukhaṃ sāttvikaṃ proktamātmabuddhiprasādajam ||

हिन्दी अनुवाद

— जो आरम्भ में विष जैसा लगता है पर परिणाम में अमृत जैसा होता है, और अपनी बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है — वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.37 का अर्थ क्या है?

— जो आरम्भ में विष जैसा लगता है पर परिणाम में अमृत जैसा होता है, और अपनी बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है — वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

भगवद्गीता 18.37 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।