भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 36 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 18.36 · सुखं त्विदानीं त्रिविधं

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥

sukhaṃ tvidānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha |
abhyāsādramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati ||

हिन्दी अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में सुनो। जिस सुख में मनुष्य अभ्यास से रमता है और जिसमें उसके दुःखों का अन्त हो जाता है —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 18.36 का अर्थ क्या है?

हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में सुनो। जिस सुख में मनुष्य अभ्यास से रमता है और जिसमें उसके दुःखों का अन्त हो जाता है —

भगवद्गीता 18.36 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।