भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 33 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.33 · धृत्या यया धारयते
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ |
yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī ||
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ, जिस अटल धृति से मनुष्य योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को थामे रखता है, वह धृति सात्त्विक है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.33 का अर्थ क्या है?
हे पार्थ, जिस अटल धृति से मनुष्य योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को थामे रखता है, वह धृति सात्त्विक है।
भगवद्गीता 18.33 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।