भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 32 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.32 · अधर्मं धर्ममिति या
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥
adharmaṃ dharmamiti yā manyate tamasāvṛtā |
sarvārthānviparītāṃśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī ||
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ, जो बुद्धि अन्धकार से ढकी होकर अधर्म को ही धर्म मान लेती है और सब बातों को उलटा ही देखती है, वह तामस है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.32 का अर्थ क्या है?
हे पार्थ, जो बुद्धि अन्धकार से ढकी होकर अधर्म को ही धर्म मान लेती है और सब बातों को उलटा ही देखती है, वह तामस है।
भगवद्गीता 18.32 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।