भगवद्गीता · अध्याय 18, श्लोक 28 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 18.28 · अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥
ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko’lasaḥ |
viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate ||
हिन्दी अनुवाद
जो कर्ता असंयमी, असभ्य, अड़ियल, कपटी, दूसरों की आजीविका बिगाड़ने वाला, आलसी, उदास और काम को टालने वाला है, वह तामस कहलाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 78 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 18.28 का अर्थ क्या है?
जो कर्ता असंयमी, असभ्य, अड़ियल, कपटी, दूसरों की आजीविका बिगाड़ने वाला, आलसी, उदास और काम को टालने वाला है, वह तामस कहलाता है।
भगवद्गीता 18.28 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 18, मोक्षसंन्यासयोग (मोक्ष-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।