भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.5 · अशास्त्रविहितं घोरं ये

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥

aśāstravihitaṃ ghoraṃ tapyante ye tapo janāḥ |
dambhāhaṃkārasaṃyuktāḥ kāmarāgabalānvitāḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जो लोग शास्त्र में न बताए गए घोर तप करते हैं, दम्भ और अहंकार से भरे होते हैं, और कामना, आसक्ति तथा बल के अभिमान से प्रेरित होते हैं —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.5 का अर्थ क्या है?

जो लोग शास्त्र में न बताए गए घोर तप करते हैं, दम्भ और अहंकार से भरे होते हैं, और कामना, आसक्ति तथा बल के अभिमान से प्रेरित होते हैं —

भगवद्गीता 17.5 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।