भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 28 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 17.28 · अश्रद्धया हुतं दत्तं च
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥
aśraddhayā hutaṃ dattaṃ tapastaptaṃ kṛtaṃ ca yat |
asadityucyate pārtha na ca tatpretya no iha ||
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ, बिना श्रद्धा के जो भी हवन किया जाए, दान दिया जाए, तप किया जाए या कोई कर्म किया जाए, वह “असत्” कहलाता है; उसका न इस लोक में कोई फल है, न परलोक में।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 17.28 का अर्थ क्या है?
हे पार्थ, बिना श्रद्धा के जो भी हवन किया जाए, दान दिया जाए, तप किया जाए या कोई कर्म किया जाए, वह “असत्” कहलाता है; उसका न इस लोक में कोई फल है, न परलोक में।
भगवद्गीता 17.28 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।