भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 24 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.24 · तस्मादोमित्युदाहृत्य

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥

tasmādomityudāhṛtya yajñadānatapaḥkriyāḥ |
pravartante vidhānoktāḥ satataṃ brahmavādinām ||

हिन्दी अनुवाद

इसलिए ब्रह्म के उपासक शास्त्र में बताए गए यज्ञ, दान और तप के कर्म सदा “ॐ” का उच्चारण करके ही आरम्भ करते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.24 का अर्थ क्या है?

इसलिए ब्रह्म के उपासक शास्त्र में बताए गए यज्ञ, दान और तप के कर्म सदा “ॐ” का उच्चारण करके ही आरम्भ करते हैं।

भगवद्गीता 17.24 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।