भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 21 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.21 · यत्तु प्रत्युपकारार्थं

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

yattu pratyupakārārthaṃ phalamuddiśya vā punaḥ |
dīyate ca parikliṣṭaṃ taddānaṃ rājasaṃ smṛtam ||

हिन्दी अनुवाद

पर जो दान बदले में कुछ पाने के लिए, या फल को ध्यान में रखकर, या मन मारकर दिया जाता है, वह दान राजस माना गया है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.21 का अर्थ क्या है?

पर जो दान बदले में कुछ पाने के लिए, या फल को ध्यान में रखकर, या मन मारकर दिया जाता है, वह दान राजस माना गया है।

भगवद्गीता 17.21 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।