भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.15 · अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat |
svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate ||

हिन्दी अनुवाद

ऐसी वाणी जो किसी को उद्विग्न न करे, सच्ची हो, प्रिय हो और हितकारी हो, साथ ही स्वाध्याय का नियमित अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.15 का अर्थ क्या है?

ऐसी वाणी जो किसी को उद्विग्न न करे, सच्ची हो, प्रिय हो और हितकारी हो, साथ ही स्वाध्याय का नियमित अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।

भगवद्गीता 17.15 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।