भगवद्गीता · अध्याय 16, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 16.12 · आशापाशशतैर्बद्धाः
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥
āśāpāśaśatairbaddhāḥ kāmakrodhaparāyaṇāḥ |
īhante kāmabhogārthamanyāyenārthasañcayān ||
हिन्दी अनुवाद
— आशा की सैकड़ों रस्सियों से बँधे, काम और क्रोध के वश में पड़े हुए, वे भोगों की पूर्ति के लिए अन्याय से धन जमा करने का प्रयत्न करते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 24 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 16.12 का अर्थ क्या है?
— आशा की सैकड़ों रस्सियों से बँधे, काम और क्रोध के वश में पड़े हुए, वे भोगों की पूर्ति के लिए अन्याय से धन जमा करने का प्रयत्न करते हैं।
भगवद्गीता 16.12 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 16, दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवासुर संपद विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।