आरती · शिव

शिव आरती — ओम जय शिव ओंकारा

“ओम जय शिव ओंकारा” उत्तर भारत में शिवजी की सबसे अधिक गाई जाने वाली आरती है। इसमें शिवजी की स्तुति उस रूप में की गई है जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक हैं — एक ही ओंकार के तीन पक्ष।

देवताशिव
रचनाकारपारंपरिक (अंतिम पद में शिवानंद स्वामी का नाम आता है)
भाषाहिन्दी
पद8

कब पढ़ें: शिव पूजा के अंत में, सोमवार को, सावन में और महाशिवरात्रि पर गाई जाती है।

आरती

  1. ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा ।
    ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥

    oṃ jay śiv oṃkārā, svāmī jay śiv oṃkārā |
    brahmā viṣṇu sadāśiv, arddhāṃgī dhārā ||

    ओंकार स्वरूप शिव की जय हो! ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव आपमें एक हैं; आपने अपनी अर्धांगिनी को अपने आधे शरीर में धारण किया है।

  2. एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे ।
    हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥

    ekānan caturānan pañcānan rāje |
    haṃsāsan garuṛāsan vṛṣvāhan sāje ||

    आप एक मुख, चार मुख और पाँच मुख वाले रूपों में शोभित हैं; आप हंस, गरुड़ और बैल पर विराजमान हैं।

  3. दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे ।
    त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे ॥

    do bhuj cār caturbhuj dasabhuj ati sohe |
    triguṇ rūp nirakhte tribhuvan jan mohe ||

    दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले रूपों में आप अत्यंत सुंदर लगते हैं; आपके त्रिगुण रूप को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।

  4. अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी ।
    त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी ॥

    akṣamālā vanmālā muṇḍamālā dhārī |
    tripurārī kaṃsārī kar mālā dhārī ||

    आप रुद्राक्ष की माला, वनमाला और मुंडमाला धारण करते हैं; आप त्रिपुरासुर और कंस का संहार करने वाले हैं और हाथ में माला धारण करते हैं।

  5. श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
    सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे ॥

    śvetāmbar pītāmbar bāghambar aṃge |
    sankādik garuṛādik bhūtādik saṃge ||

    आप श्वेत वस्त्र, पीतांबर और बाघंबर धारण करते हैं; सनक आदि मुनि, गरुड़ आदि और भूतगण आपके साथ रहते हैं।

  6. कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी ।
    सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी ॥

    kar ke madhya kamaṇḍalu cakra triśūldhārī |
    sukhkārī dukhhārī jagpālan kārī ||

    आपके हाथों में कमंडल, चक्र और त्रिशूल हैं; आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।

  7. ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
    प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका ॥

    brahmā viṣṇu sadāśiv jānat avivekā |
    praṇvākṣar meṃ śobhit ye tīnoṃ ekā ||

    अज्ञानी लोग ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग समझते हैं; ओंकार अक्षर में ये तीनों एक होकर शोभित हैं।

  8. त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे ।
    कहत शिवानन्द स्वामी सुख संपति पावे ॥

    triguṇasvāmī jī kī ārtī jo koi nar gāve |
    kahat śivānanda svāmī sukh saṃpati pāve ||

    शिवानंद स्वामी कहते हैं कि जो कोई त्रिगुण के स्वामी शिवजी की यह आरती गाता है, उसे सुख और संपत्ति प्राप्त होती है।

पाठ गिनती

आपने शिव आरती — ओम जय शिव ओंकारा का पाठ कितनी बार किया — यह गिनती इसी डिवाइस पर सहेजी जाती है।

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देवनागरी पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है; हिन्दी अर्थ हमारा अपना है। अलग-अलग संस्करणों और गायकों के पाठ में थोड़ा अंतर हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव आरती — ओम जय शिव ओंकारा की रचना किसने की?

शिव आरती — ओम जय शिव ओंकारा की रचना पारंपरिक (अंतिम पद में शिवानंद स्वामी का नाम आता है) ने की है। यह हिन्दी में है।

शिव आरती — ओम जय शिव ओंकारा का पाठ कब करना चाहिए?

शिव पूजा के अंत में, सोमवार को, सावन में और महाशिवरात्रि पर गाई जाती है।

शिव आरती — ओम जय शिव ओंकारा किस बारे में है?

“ओम जय शिव ओंकारा” उत्तर भारत में शिवजी की सबसे अधिक गाई जाने वाली आरती है। इसमें शिवजी की स्तुति उस रूप में की गई है जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक हैं — एक ही ओंकार के तीन पक्ष।