भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.15 · ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
jñānayajñena cāpyanye yajanto māmupāsate |
ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham ||
हिन्दी अनुवाद
कुछ अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ के द्वारा मेरी उपासना करते हैं — कोई मुझे एक रूप में, कोई भिन्न रूप में, और कोई अनेक रूपों में, क्योंकि मेरा मुख सब ओर है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.15 का अर्थ क्या है?
कुछ अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ के द्वारा मेरी उपासना करते हैं — कोई मुझे एक रूप में, कोई भिन्न रूप में, और कोई अनेक रूपों में, क्योंकि मेरा मुख सब ओर है।
भगवद्गीता 9.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।